A human thought on Life ़़ं़़़़ं़़़ं़़़़ं़़़़ं़़़़़ं़़ं़़़़ं़़़़ं़़़ं़़
शाम ढलने पर घर आया करो
कुछ परिंदों की निगाहें उजालों पर हैं
एक-एक दाने पर निगाहें डाल बैठा है
अजीब शख्स है
मचानो पर घर बसा बैठा है।
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