The Gac Thought's # 118

शाम ढलने पर घर आया करो

कुछ परिंदों की निगाहें उजालों पर हैं

एक-एक दाने पर निगाहें डाल बैठा है

अजीब शख्स है

मचानो पर घर बसा बैठा है।


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