The Gac Thought's # 123

 कैद मुझको देखकर शर्मा गई

मेरी हालत पे रोने लगी

कुछ कहने लगी

अपनी रिहाई की तारीख बता

अपनी आजादी की अर्जी लगा

तेरे गुनाह दिखते नहीं

तेरे कोई सवाल होते भी नहीं

बोल मैं रास्ता दिखा दूं

इस कैद को मिटा दूं

मैं आसमां को देखता रहा

वह कुछ समझता गया।

     ( Credit- Mr. Gac )


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