A human thought on Life ़़ं़़़़ं़़़ं़़़़ं़़़़ं़़़़़ं़़ं़़़़ं़़़़ं़़़ं़़
कुछ कहना था शायद
कुछ सुनना भी था शायद
मिलने पर निगाहें अक्सर बयां कर देती हैं
सिरहने बदन को झकझोर देती है
पलक झपक के सब बयां करता है
खामोशी एक लंबी दास्तानो के
कुछ
(Credit- Mr. Gac )
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