The Gac Thought's # 178

हो उम्र जो भी
ख्वाहिशें ये नहीं देखती
कभी आग दरिया में नहीं लगती
ये वक्त हमसे जो आंख मिचोली न करता
वरना तुम्हारे मुंह में तुम्हारी जुबान ना होती।

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