A human thought on Life ़़ं़़़़ं़़़ं़़़़ं़़़़ं़़़़़ं़़ं़़़़ं़़़़ं़़़ं़़
कभी जुबा पे नहीं आई तेरी बेवफाई
तू समझ कब मोहब्बत की थी तुझसे जो निभाई नहीं गई।
अरमां अब भी है उसके दिल में मुझसे मिलने की
पर क्या करें अब मेरे दिल में मोहब्बत की जगह ही नहीं।
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