The Gac thought's #186


रह-रह के क्यों चुभता हूं तुम्हारे ज़हन में

मैं न काटा न फुल तुम्हारे ज़हन में

ढुंढो कोई नींद में तुम्हे परेशा करता है

तुम्हारे गुनाहों का हिसाब मांगता है।

  (Credit:Mr.Gac)



 

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