A human thought on Life ़़ं़़़़ं़़़ं़़़़ं़़़़ं़़़़़ं़़ं़़़़ं़़़़ं़़़ं़़
नींद को ओढ़ के हमने इक रात बमुश्किल से
गुजारी थी।
कमबख्त रात एैसी थी
दिन होने का नाम न लेती थीं
कुछ गुज़रे हुए फंसाने थे
कुछ आने वाले नजारे थे
पुरी रात जुगनुओ के संग कुछ गीत गुनगुनाती थी।
(Credit: Mr. Gac)
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