The Gac thoughts#193

 नींद को ओढ़ के हमने इक रात बमुश्किल से

 गुजारी थी।

 कमबख्त रात एैसी थी

 दिन होने का नाम न लेती थीं

 कुछ गुज़रे हुए फंसाने थे 

 कुछ आने वाले नजारे थे 

 पुरी रात जुगनुओ के संग कुछ गीत गुनगुनाती थी।

     (Credit: Mr. Gac)







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