The Gac thoughts #204


कमबख्त उम्र दगा दे गई।
हम तो जमीं को अपना घर बना बैठे।
सफ़र तो सफ़र है कोई अपना निजी मकान थोड़े हैं।
तमाम उम्र कुछ पाने के जद्दोजहद में अपना मुकाम
खो बैठे।
खुद से ज्यादा तुझ पे भरोसा किया।
तेरी परछाई तक नज़र नहीं आई।

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